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परंपरा और संस्कृति किस तरह विविधतायुक्त भारतीय जनमानस को एक राष्ट्रमाला में लड़ी की तरह पिरोती है, इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है रामलीला। ताड़का वध, सीता स्वयंवर, लक्ष्मण-परशुराम संवाद, राम बरात, वन गमन, रावण दहन और भरत मिलाप के प्रसंग रामलीला के प्रमुख आकर्षण होते हैं। प्रदेश की सैकड़ों साल पुरानी रामलीलाओं में स्थान और स्वरूप में कछ अंतर जरूर आ जाता है, कहीं स्वयंवर का प्रसंग और लक्ष्मण- परशुराम संवाद पूरी रामलीला की जान होती है तो कहीं राम बरात। कहीं रावण का पुतला दहन तो कहीं भरत मिलाप का प्रसंग मुख्य आकर्षण बन जाता है। विशेषताओं से ओतप्रोत प्रदेश की ऐसी ही रामलीलाओं का विहंगावलोकन -
एक राम, अनगिनत लीलाएं
मुस्करा रही शाम-ए-अवद
लखनऊ में इन दिनों शाम-ए-अवध रामलीला के मंचन से गलजार है। नवरात्र के पहले दिन से दशहरे तक शाम होते ही रौनक देखते ही बनती है।16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास की ओर से चारपाई से शुरू की गई ऐशबाग रामलीला ने भी विकास के साथ कदमताल किया है। यहां डिजिटल मंचन युवाओं को भी अपनी ओर खींच रहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने आयोध्या से आए साधु-संतों के साथ पहली बार रामलीला का मंचन कराया था।


साधु-संत खुद लीला करते थे। संयोजक आदित्य द्विवेदी ने बताया कि वर्ष 1773 में रामलीला का प्रचलन ऐसा चला कि नवाब आसिफुद्दौला भी रामलीला देखने आते थे। रामलीला का अनवरत मंचन चलता रहे, इसके लिए नवाब ने हिंदू और मुस्लिम भाईचारे को बढ़ाने के मकसद से ऐशबाग में साढ़े छह एकड़ जमीन रामलीला के लिए और सड़क के उस पार साढ़े छह एकड़ जमीन ईदगाह के लिए दे दी। समिति के अध्यक्ष हरिश्चंद्र अग्रवाल ने बताया कि 1857 की क्रांति हुई। 1859 में साधुओं ने सोचा कि संभ्रात लोगों को जोड़कर समिति बनाकर मंचन किया जाए। इसके बाद से रामलीला अनवरत चल रही है।

राम बरात की शोभा न्यारी

मेरठ में पहले एक ही रामलीला होती थी। 1960 से शहर और छावनी में अलग-अलग रामलीला होने लगी। रामलीला कमेटी से जुड़े लोगों के अनुसार, 90 साल से यहां रामलीला का आयोजन हो रहा है। मेरठ की रामलीला की प्रमुख विशेषता राम बरात और यात्रा है। दोनों रामलीलाओं में शिव बरात, राम बरात, वनवास यात्रा और भरत मिलाप यात्रा निकाली जाती हैं। 

शहर रामलीला में वृंदावन और मथुरा की पार्टियां मंचन करती हैं। व्यास गद्दी से रामचरित मानस का पाठ होता है। यहां महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष कलाकार निभाते हैं। खास बात यह है कि राम-लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता और हनुमान की भूमिका ब्राह्मण परिवार के कलाकार निभाते हैं। मंचन के दौरान मुख्य पात्र संयमित जीवन जीते हैं। निर्देशक और कलाकार धार्मिक कार्यक्रमों से ही जुड़े रहते हैं। रामलीला कमेटी का संविधान भी है।
श्रीराम से दिन की शुरुआत, उनसे ही सांझ 
कानपुर के मेस्टन रोड (परेड) का रामलीला भवन दो हफ्ते के लिए अयोध्या बन जाता है। यहां प्रभु ने अगर आहार नहीं लिया तो कोई भोजन नहीं करता। कृष्ण की नगरी मथुरा से आए कलाकार इस मर्यादा का शिद्दत से पालन करते हैं। लीला तो रात में होती है लेकिन, दिन में भी सभी कलाकार पात्रों से ही पुकारे जाते हैं। भरत मिलाप की शोभायात्रा में हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई...सभी पुष्पवर्षा करते हैं।
खजुहा में रावण जलाया नहीं जाता
रामलीला हमेशा ही एक खास मंच पर होती है लेकिन, फतेहपुर जिले में छोटी काशी के नाम से विख्यात खजुहा कस्बे में यह रोज नए मंचों पर होती है। 550 वर्षों से यहां रावण मारा तो जाता है लेकिन, जलाया नहीं जाता। लीला भी दशहरा से चालू होती है। इस साल 15 अक्टूबर को रावण वध होगा। इससे पहले, रामजानकी मंदिर के पुजारी श्रीराम से पहले रावण के सिर की एक हजार बत्तियों वाली (हजारा आरती से) पूजा करते हैं। आयोजन कमेटी के अध्यक्ष दयाराम उत्तम बताते हैं कि रावण, मेघनाथ व कुंभकरण के पुतले 50-60 फीट ऊंचे व 15-20 फीट चौड़े रखे जाते हैं। दिन में ये नगर-भ्रमण करते हैं।
लीला से पहले हरितालिका तीज के दिन कस्बे के लोग नरहिया झील से मिट्टी, कुश आदि लाकर गणेश प्रतिमा बनाते हैं। दशहरे को गणेश पूजन के साथ रामलीला का शुभारंभ होता है। राम व रावणदल के स्वरूपों को लकड़ी, कुश व सूमा से बनाते हैं। कमेटी से जुड़े अर्जुन तिवारी बताते हैं कि पहले रावण का सिर तांबे का होता था, अब लकड़ी, कुश, मेथी, कागज का बनाते हैं। 10 क्विंटल वजनी 10 सिर में से एक गधे का भी होता है। हाथ होते हैं 20 । रावण वध के बाद तेरहवीं भी करते हैं। कमेटी के चमनलाल गुप्त बताते हैं कि राम, लक्ष्मण, भरत व शुत्रघ्न लकड़ी के पहिये वाले घोड़ों पर बैठकर युद्ध करते हैं। आस्था ऐसी कि घोड़ों को गांव वाले असली जेवर से सजाते हैं। कमेटी के मनोज गुप्ता व विनय गुप्ता बताते हैं कि मेघनाद आज भी लक्ष्मण को मंत्रोच्चार वाली शक्ति मारते हैं।
सबसे उम्दा रामलीला
प्रयागराज में तकनीकि से सज्जित श्री पथरचट्टी कमेटी की रामलीला को करीब तीन साल पहले एक सर्वेक्षण में देश की सबसे उम्दा रामलीला होने का तमगा मिला था। रामबाग क्षेत्र में दोमंजिला मंच पर लीला की प्रत्येक दिन शुरुआत कैलास पर्वत पर भगवान भोलेनाथ द्वारा देवी पार्वती को रामकथा सुनाने के साथ होती है। आकाश मार्ग से राक्षसी ताड़का के आने, सीता का हरण कर रावण के आकाश मार्ग से लंका की ओर भागने, मेघनाद वध तथा फाइबर से बनाए गए कुंभकर्ण का बड़े भाई रावण से संवाद और फिर राम से युद्ध में अंग-अंग कटकर भूमि पर गिरने की लीला को देखने का क्रेज ऐसा है कि प्रवेश के लिए पास पाने की मारामारी होती है। नित नए आयाम गढ़ने के लिए भारी भरकम बजट खर्च किया जाता है।
गजब है सरोवर में लीला 

अलीगढ़ की अचलताल स्थित सरयूपार लीला पूरे पश्चिमी यूपी में प्रसिद्ध है। यहां रामलीला का इतिहास करीब 120 वर्ष पुराना है। रामलीला मैदान के निकट ही एक विशाल अचल सरोवर है। द्वापर युग में अज्ञातवास के समय पांडव के छोटे भाई नकुल और सहदेव ने इस सरोवर में स्नान किया था। इसके बाद से इस सरोवर की धार्मिक मान्यता बढ़ती गई। 50 वर्ष पहले सरोवर में नहर के द्वारा गंगा नदी का जल आता था। वर्तमान में बारिश के जल से सरोवर भरा रहता है। प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास होने के बाद वह अयोध्या सेवन की ओर प्रस्थान करते हैं। उसी के बाद अचल सरोवर स्थित सरयूपार लीला का मंचन होता है। विशाल सरोवर में नाव पर प्रभु श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण सवार होते हैं। आकर्षक रोशनी से पूरे सरोवर को सजाया जाता है। नाव से प्रभु के सरयूपार होने की लीला देखते ही बनती है। राम लीला कमेटी की ओर से ऐसी व्यवस्था की जाती है कि मानों लगता है कि त्रेतायुग की ओर लौट चले हैं। प्रभु को नाव से पार होते देख दर्शकों की आंखें भर आती हैं। सरोवर के चारों ओर आधा दर्जन से अधिक घाट बने हुए हैं, उन्हीं घाटों की सीढियों पर दर्शक बैठकर लीला का आनंद लेते हैं।
राम व दुर्गाबाड़ी की मां दुर्गा का मिलन
बर्डघाट गोरखपुर की रामलीला का इतिहास 161 साल पुराना है। शहर में इसे सबसे प्राचीन रामलीला का दर्जा प्राप्त है। कहा जाता है कि बर्डघाट मैदान पर रामलीला का मंचन तो इससे पहले भी होता था, लेकिन 1858 में इसे स्वरूप मिला, आयोजन समिति का गठन हुआ। यहां परंपरागत राम बरात व वन यात्रा का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है। दशहरा के दिन राघव-शक्ति मिलन के विशिष्ट कार्यक्रम में इसी रामलीला की भागीदारी रहती है। इसे देखने मानो पूरा शहर उमड़ पड़ता है। बसंतपुर चौराहे पर बर्डघाट की रामलीला के भगवान राम व दुर्गाबाड़ी की मां दुर्गा का मिलन होता है। इस मिलन के उपरांत राम रामलीला मैदान लौटते हैं और रावण का वध करते हैं। राघव-शक्ति मिलन परंपरा की शुरुआत 1948 में हुई थी।
मैदान में लड़ती हैं सेनाएं
135 वर्षों का इतिहास समेटे आगरा में रामलीला का आयोजन करीब 25 दिन चलता है। अनंत चतुर्दशी को गणेशजी की शोभायात्रा से शुरू होकर दशहरा पर रावण दहन के साथ विश्राम पाती है। इतना लंबा रामलीला का आयोजन शायद ही कहीं होता हो। खास यह है कि श्रीराम-रावण युद्ध सहित तमाम प्रसंग मंच के स्थान पर मैदान में होने से जीवंतता और रोमांच पैदा करते हैं। श्री रामलीला कमेटी शहर के किसी धनी-मानी व्यक्ति को राजा दशरथ के तौर पर चयन करती है। श्री रामलीला कमेटी के महामंत्री श्रीभगवान अग्रवाल के अनुसार पित पक्ष की एकादशी को निकलने वाली उत्तर भारत की प्रसिद्ध राम बरात कई किलोमीटर लंबी होती है। शोभायात्रा में करीब 125 झांकियां और दर्जनों बैंड पार्टियां शामिल रहती हैं। मुख्य शहर और बाजारों में भ्रमण करते हुए जनकपुरी तक पहुंचने में बरात को करीब 12 घंटे लगते हैं। बरात देखने दूर-दूर से लाखों लोग एकत्रित होते हैं।
केवट प्रसंग प्रमुख आकर्षण
बरेली में 16वीं शताब्दी में राजा बसंत राय ने रानी साहिबा की याद में चौधरी तालाब मुहल्ला में रानी लक्ष्मीबाई रामलीला की शुरुआत की थी। केवट प्रसंग का सजीव मंचन इसका प्रमुख आकर्षण है। वहां तालाब में नाव चलती है, तमसा नदी पार करने का मंचन होता है। कमेटी अध्यक्ष रामगोपाल मिश्रा बताते हैं कि तालाब में केवट संवाद के बाद आगे की रामलीला मैदान में होती है। जोगी नवादा में होने वाली रामलीला वर्ष 1968 से अनवरत है। इसका प्रमुख आकर्षण रामलीला के दौरान सुबह के समय होने वाली रासलीला और दशहरा मेले में होने वाला दंगल है। जिसमें महिला पहलवान भी दांव आजमाती हैं। मेला संयोजक गिरधारी लाल साहू कहते हैं कि यह शहर का एकमात्र मेला है। जहां रामलीला और रासलीला एक दिन ही होती है। मॉडल टाउन स्थित दशहरा मेला ग्राउंड में 67 वर्षों से मेला लगता है। यहां तीन दिवसीय रामलीला होती है।
मदीनाथ रामलीला में वर्ष 1960 में लगातार मंचन होता आ रहा।
लीक से न डिगने का अनुष्ठान 
तकनीकी विकास के लंबे दौर के बाद भी बनारस में रामनगर की लीला में आज तक माइक का प्रयोग होते किसी ने न देखा, न ही सुना। बावजूद इसके भक्ति रसपान के लिए टूट पड़े मजमे पर जोरदार संवाद अदायगी भारी पड़ जाती है। दशकों से वैसे ही श्रद्धाभाव टपकाती है। केवल एक च्चुप रहो' का कॉशन और चारो ओर चपिन ड्राप' सन्नाटा। रही रोशनी की बात तो जैसे प्रभु पात्रों व भक्तों के हृदय से ही किरणें एकाकार हो रही हों। आज भी महताबी की रोशनी में लीला अपना रुतबा संजोए है। हर प्रसंग महताबी की रोशनी से जगरमगर और दृश्य के मिजाज मुताबिक महताबी के रंग तद्नुसार जुदा-जुदा भाव जगाते हैं। भक्ति भाव उभारने को श्वेत तो युद्ध के दृश्यों के लिए चटक लाल प्रकाश रंग पसर जाते हैं। मंच भी अरसे से स्थायी, किसी चबूतरे पर राम की अयोध्या तो कोई रावण की लंका बन गया। सरोवर, कूप  व बगीचे भी किष्किंधा, पंचवटी, अशोक वाटिका के रूप में प्रभु की लीला के निरंतर साक्षी होते होते, अब उन्हीं पौराणिक नामों से पहचान पा गए। तैयारी का अंदाज भी वही पुराना, लीला शुरू होने के दो माह पहले से लेकर खत्म होने तक पात्र भौतिकता से एकदम दूर
और चारो ओर केवल भक्ति भाव प्रधान हो जाता है। परिधानों व पकवानों को भी जैसे आधुनिकता की हवा से गुरेज हो। रही देखवइयों की बात तो जैसी प्रभु की लीला वैसी उनकी भक्त मंडली।






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